



गौरव श्रीवास्तव/अमन गुप्ता,आजमगढ़ बीमारी के समय आर्थिक संकट से बचने के लिए लोग हेल्थ इंश्योरेंस को सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं, लेकिन कई बार बीमा कंपनियों की मनमानी मरीजों और उनके परिवारों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है। ऐसा ही एक मामला आजमगढ़ में सामने आया, जहां इलाज के लिए पहले अप्रूवल देने के बाद बीमा कंपनी ने पुरानी बीमारी का हवाला देकर भुगतान करने से इनकार कर दिया। मामले में उपभोक्ता फोरम ने पीड़ित मरीज के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी को 4 लाख 77 हजार रुपये 9 प्रतिशत ब्याज सहित भुगतान करने का आदेश दिया है।जानकारी के अनुसार आजमगढ़ शहर के सिधारी निवासी अनुपमा तिवारी पत्नी अमित तिवारी ने वर्ष 2017 में हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी कराई थी। बाद में यह पॉलिसी नीवा बूपा इंश्योरेंस कंपनी में शिफ्ट हो गई। वर्ष 2021 में तबीयत खराब होने पर अनुपमा को लखनऊ स्थित मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। इलाज के लिए कैशलेस सुविधा हेतु बीमा कंपनी से अनुमति मांगी गई, जिस पर कंपनी ने प्रारंभिक अप्रूवल दे दिया।इलाज पूरा होने के बाद जब डिस्चार्ज की प्रक्रिया शुरू हुई तो बीमा कंपनी ने अचानक अपना अप्रूवल वापस लेते हुए अस्पताल प्रशासन को मरीज से पूरा भुगतान लेने का निर्देश दे दिया। कंपनी ने मरीज को पुरानी बीमारी होने का हवाला देकर क्लेम देने से इनकार कर दिया। अचानक आए इस फैसले से मरीज और परिजन मुश्किल में पड़ गए। किसी तरह धन की व्यवस्था कर अस्पताल का भुगतान किया गया, तब जाकर मरीज को डिस्चार्ज मिल सका।बीमा कंपनी के इस रवैये से नाराज होकर पीड़ित पक्ष ने उपभोक्ता फोरम आजमगढ़ में वाद दाखिल किया। मामले की सुनवाई के दौरान उपभोक्ता फोरम ने उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों का परीक्षण किया। अपने फैसले में फोरम ने कहा कि बीमा कंपनी केवल पुरानी बीमारी का हवाला देकर इलाज का भुगतान रोक नहीं सकती। यदि कंपनी ने बीमा जारी किया है तो यह उसकी जिम्मेदारी थी कि पॉलिसी जारी करने से पहले स्वास्थ्य परीक्षण कराती।फोरम ने माना कि इलाज के दौरान क्लेम खारिज करना उपभोक्ता के साथ अनुचित व्यवहार है। इसी आधार पर फोरम ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह वादी को 4 लाख 77 हजार रुपये की राशि 9 प्रतिशत ब्याज सहित भुगतान करे।
